पत्रकार किसलिए होते हैं? पत्रकारों से लोग दोस्ती क्यों करते हैं? यह दो सवाल शायद आपने कभी न सोचा हो पर यह एक बड़ा ही रोचक विषय है। मैं कई दिनों से इस विषय पर सोच रहा हूं। मेरा एक दोस्त बना। उसका नाम था नाम नहीं बताउंगा। अगर उसने यह ब्लाग पढ़ लिया तो नाराज न हो जाए। मेरे नए दोस्त ने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड दिया। मैंने भी अपना विजिटिंग कार्ड उसे दिया। उसने कहा थैंक्स। और बोला- कभी किसी पुलिसवाले ने आते जाते रोका तो आपको फोन करुंगा।
इसके बाद मेरे पास जवाब नहीं बचा और कुछ भी कहने को नहीं बचा। हालांकि कोई और होता तो शायद सीना फुलाकर कहता- क्यों नहीं, हम आखिर काम किस दिन आएंगे। वास्तविकता तो यह है कि पत्रकार ऎसी बातें सुनकर खुश भी होते हैं और एक वास्तविकता यह भी है कि जब काम पड़ता है तो कोई काम नहीं आता।
पत्रकारों ने खुद ही अपनी ऎसी छवि बना ली है। हम आम लोग नहीं रहे हैं। हर कोई टेंशन देने की सोचता है। क्या हम लोग केवल पुलिस से पंगा लेने के लिए ही हैं? क्या बड़े लोगों को फोन पर डराने के लिए हैं? क्या पत्रकार एक चालान बचाने के लिए हैं?
इन प्रश्नों पर गहराई से सोचा। मेरे दोस्त वाली घटना के अगले ही दिन मेरे किराए के घर पर गैस एजेंसी वाला आया। बोला आपने कनेक्शन के लिए एप्लाई किया था मैं जांच के लिए आया हूं। वह रसोई देखकर बोला आपके पास तो पहले ही गैस है। कनेक्शन नहीं मिलेगा। इससे पहले भी यही एजेंसी वाले हमें काफी परेशान कर चुके थे। हमने बताया नहीं था कि हम पत्रकार हैं। जांच करने आए आदमी से उसके बास का नंबर लिया और बात की। उसे कहा कि हम फलां फलां अखबार से बोल रहे हैं। आपका आदमी यह बात कह रहा है। तो आप बताएं कि क्या हो सकता है। यदि हो सकता है तो ठीक नहीं तो हम कुछ और करें।
एजेंसी के मालिक ने अपने आदमी को उसी वक्त फोन करके धमकाया और कहा कि इनका फार्म भर लाऒ। दोंनों घटनाएं मुझे परेशान कर रही हैं। अपने सवाल का जवाब तो मिल गया लेकिन.......